शिष्य जब स्वयं को मन से गुरु के चरणों में समर्पित कर देता है तो यही मन जो पहले बेकाबू था- धीरे-धीरे गुरु की रहमत से नियंत्रित होने लगता है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध नाटककार विलियम शेक्सपियर ने अपने नाटक ('वेरोना के दो सज्जन') (The Two Gentlemen of Verona) के एक दृश्य में यह रोचक संवाद प्रस्तुत किया है-
एक धनी व्यक्ति दूसरे धनी व्यक्ति के नौकर को कोई बात समझाने का प्रयास कर रहा था। बार-बार समझाने के बावजूद जब वह नौकर बात नहीं समझता तो वह व्यक्ति खीझकर कह उठा, "तू तो बड़ा मूर्ख है, इतनी सी बात भी नहीं समझता ! देख, यह बात तो मेरे हाथ की छड़ी तक समझ गई है!" सेवक विनम्रता से मुस्कुराते हुए उत्तर देने लगा, "हुजूर, आपके हाथ की इस छड़ी और मुझमें बड़ा अंतर है। यह छडी आपके वश में है, लेकिन मैं आपके वश में नहीं हूँ। मन को वश में करना कठिन है, पर सत्गुरु की कृपा से यह भी संभव हो जाता है। पवित्र गुरबाणी में कहा है-
पूरि रहिआ सरबत मै सो पुरखु बिधाता। मारगु प्रभ का हरि कीआ संतन संगि जाता। (श्री आदिग्रन्थ अंग/1122)
सत्गुरु के कहे को श्रद्धा से मान लेना तभी सार्थक होता है जब मन को उनके इशारे के अनुसार सत्य की ओर मोड़ लिया जाए। यह निर्णयात्मक पहलू, शिष्य की आंतरिक प्रगति का संकेत है। इसी संसार में रहते हुए, मन को भ्रम से हटाकर सत्य की ओर उन्मुख करना और सत्गुरु की कृपा से सच्ची रहमत को प्राप्त कर लेना ही मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। भगत नामदेव जी ने इस का जिक्र किया :-
मिथिआ भरमु अरु सुपन मनोरथ सति पदारथु जानिआ।
सुक्रित मनसा गुर उपदेसी जागत ही मनु मानिआ।
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै बीचारी।
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी।
(श्री आदिग्रन्थ-अंग/485)
जैसे कसौटी पर परखने से ही यह ज्ञात होता है कि सोना खरा है या नहीं, उसी प्रकार सत्य की प्राप्ति से ही यह स्पष्ट होता है कि सत्य क्या है और क्या नहीं। यही वह मंजिल है जिसे मानव भूल चुका है। और उसी भूली हुई मंज़िल को पुनः प्राप्त कर, उसकी स्मृति में जीवन जीना ही मानव जीवन की सच्ची बरकत (कृपा) है। जब सभी भेद, भ्रम और द्वंद्व पीछे छूट जाते हैं और मनुष्य सत्य के साथ एकरूप होकर जीवन जीने लगता है-तब वही जीवन सत्गुरु की रहमत का प्रतीक बन जाता है। यही मानव जीवन की चरम साधना और वास्तविक पूर्णता है।
Voice by Utkarsh Nirankari
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